बुधवार, मई 28

जिंदगी एक कविता

नहीं सूझती कविता अब कोई,
जिंदगी खुद एक कविता बनी है।
ढली है सुरमई शाम बनकर,
शंखनाद बन सुबह को गूंजी है।
विराम मिला है बुद्धि को,
जैसे युद्ध के बाद,
प्रेम युग की शुरुआत हुई है।
जीत हार से परे अब,
जीवन की पुकार सुनी है।
धीर पनपता है भीतर मेरे,
क्या बताऊं तुम्हें,
सुकून की बरसात उमड़ी है।
एक अद्भुत रौशनी मार्ग खड़ी है,
जब से,
जिन्दगी खुद एक कविता बनी है।
© गुंजन झाझारिया

3 टिप्पणियाँ:

यहां गुरुवार, मई 29, 2014, Blogger Rewa Tibrewal ने कहा…

waah bahut sundar kavita

 
यहां गुरुवार, मई 29, 2014, Blogger Vaanbhatt ने कहा…

सुन्दर भाव...बहुत खूब...

 
यहां सोमवार, अप्रैल 17, 2017, Blogger Kavi Ravindra Pandey ने कहा…

वाह

क्या खूब लिखा है जिंदगी के बारे में...

 

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