जिंदगी एक कविता
नहीं सूझती कविता अब कोई,
जिंदगी खुद एक कविता बनी है।
ढली है सुरमई शाम बनकर,
शंखनाद बन सुबह को गूंजी है।
विराम मिला है बुद्धि को,
जैसे युद्ध के बाद,
प्रेम युग की शुरुआत हुई है।
जीत हार से परे अब,
जीवन की पुकार सुनी है।
धीर पनपता है भीतर मेरे,
क्या बताऊं तुम्हें,
सुकून की बरसात उमड़ी है।
एक अद्भुत रौशनी मार्ग खड़ी है,
जब से,
जिन्दगी खुद एक कविता बनी है।
© गुंजन झाझारिया


3 टिप्पणियाँ:
waah bahut sundar kavita
सुन्दर भाव...बहुत खूब...
वाह
क्या खूब लिखा है जिंदगी के बारे में...
एक टिप्पणी भेजें
सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]
<< मुख्यपृष्ठ