शुक्रवार, दिसंबर 27

यथार्थ

मूक बाज़ार,
भीतर सुर ताल,
सुनसान जखीरा,
राही नाच,
तालियाँ चुप,
दीवारों में मल्हार,
रेत स्वप्न,
उडती आंधियों में,
टीला चमकती चांदनी,
शांत बयार,
चीखते नयन,
गुंजन सागर का,
डूबते मोती,
रेत नम,
मैं स्तब्द एक दर्शक,
सुनती,
चुप,
हाथ हथियार,
गिरे,
खुद पांव पर,
बहुत हुआ,
बस कहती रही।
लड़ना किससे,
खुद से,
ना,
बस प्रेम,
अपने मन से,
स्वार्थ,
नहीं यथार्थ,
बस यही यथार्थ।।।
गुंजन झाझारिया

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बदलाव

क्या लिखे तू गरीबी, बीमारी।
लेखनी तेरी क्यों डूबे दर्द में।
तार लिख, बाँटने को।
सार आत्मसात करने को।
वो भाव मुर्दे में जान फूंके,
हाथ थामे, भटके का।
पावन अहसास लिख।
लिखना है,
तो,
उंचाई, जूनून,ख्वाईश लिख,
मेहनत का रंग लिख।
धैर्य और उमंग लिख।
कह दे अपनी कलम से,
हो गई है हालत बदतर,
अब तो बचाव लिख।
बस बदलाव लिख।।
गुंज झाझारिया

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शनिवार, दिसंबर 21

प्रतिक्रिया पाठकों की

दिनांक 26 अक्टुम्बर को प्राप्त हुई प्रतिक्रिया।

On Sat, Oct 26, 2013 at 8:45 AM, dhaka jaivardhan <jaivardhandhaka957@gmail.com> wrote:
hey ..my name is jai Dhaka ....usually I was reading about fiction,poetery,about great philosophers etc bt today randomly I read ur poets and I feel it have great deepness ...nyc work . u have  tremendously describe thoughts of nearer to soul which are hardly come out ...m inspired from u ....great job ...god bless u ...carry on ..

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