सोमवार, जनवरी 24

वजह है हमारी दोस्ती

कैसे परिभाषा दे?
कैसे कोई भाव में व्यक्त करे?
कैसे किसी को समझाएं 
या
कैसे बतलाया जाये?


 कितनी अच्छी दोस्ती है
या 
दोस्ती कितनी अच्छी है?


वजह है
शब्द नहीं हैं...






मजाक उडाना 
या इशारों में समझ जाना
चिड़ना 
या पलटवार करना
गालियाँ देना 
या प्यार दिखलाना
मुश्किल से बचाना
या हर ख़ुशी का हिस्सा बनना
साथ नाचना 
या नाचते हुए देखना
पैसे भरना 
या जेब खली होने का बहाना करना
सब कुछ 
में अपनापन नजर आता है,




वजह है
आपस की 
समझ और प्यार.


ख़ुशी में गम,
गम में ख़ुशी का अहसास किया,
मेरी ही दुआओं  पर  अफ़सोस
किया मैंने


अब कैसे कहदू नहीं जाने को
 मन नहीं लगेगा,
या अकेली रह जाउगी?


नहीं कह पाउगी..
वजह है तुम्हारी ऊंचाई..


मान हो तुम मेरा
मेरा अभिमान भी
   
मेरा गौरव और
मेरा सम्मान भी  


वजह है
 तुम्हारी कामयाबी


राह एक नयी शुरू होगी
सफ़र एक नया तय करना है
एक नए युद्ध का आरंभ है


जाओ
और नाम कमाओ
धन, बुधि, एश्वर्या से
परिपूर्ण हो जाओ


है विश्वास भी 
कामना भी है
मेरी कामना,
और मेरा विश्वास भी है.


वजह है हमारी दोस्ती












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शनिवार, जनवरी 15

भक्सु

कटार सी  काट दें चाहे तेरी जबान.
या चले कोई चाल तू महान.


प्यास गहरी है यहाँ,
लगन प्रहरी है यहाँ,
निश्चय दोपहरी है यहाँ,
विश्वास लहरी है
यहाँ,
जीत सुनहरी है यहाँ,



वक़्त की तेज़ धार आये ,
भूखे शेर का सामना हो जाये




दात पैने है उसके,
तो मैं भक्सु हू.


भक्सु हू मैं 
जीत की , 


भक्सु हू मैं
तेरी हार की


भक्सु हू मैं
हर अट्हास की


भक्सु हू मैं,
प्रहार की,




रोकने से पहले मेरे कदम
उठाने से पहले 
ऊँगली अपनी,
जताने से पहले
जीत तेरी,




कर कान साफ़ अपने,
खोल ले बुधि के पोर
बिठा बात ये अच्छे से


भक्सु हू मैं
मैं भक्सु हू.
























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शनिवार, जनवरी 8

लगन

दूर छितिज़ पर धूल उड़ाती दिखाई दे,
समझ लेना अश्व विजयी होने का पैगाम ला रहा है,

घने काले बादल के चारों और जो दिखाई दे,
गुलाबी रंग.
समझ लेना सूर्य अपना तेज बरसाने जा रहा है.

अंतिम मंजिल तो बस जानते हैं सब,
परन्तु राह पर खड़े हने कि जिद

ने ना हासिल करने दिया इसे


साम, दाम, दंड, भेद
अपनाये थे महापुरुषों ने भी
फिर तू क्यों रुका है,.
बस पलक झपका
और देख 
अपनी मंजिल को.


सूर्य जानता है,
मुझे अपना प्रकाश 
कैसे फलाना है,
कैसे जग को रोशन 
करना ह
और कैसे तम 
को दूर भागना है.




घनी  काली  बदली को 
चिर ना सके मेरी किरने 
तो क्या हुआ?
उसके चारो और से 
मैं अपने आने का पैगाम तो दू.




देख ना सके वो
तरसती अंखिया तो क्या हुआ,
धूल डालकर आँख  में 
थोडा आराम तो दू.


झूझती हैं वो किरने
बादल से छनकर आने को.
कटे तो होंगे हजारो सर युद्ध में 
जीत जाने को 




लगन वही तुझमे देखी मैंने 
जो नदिया में थी
सागर से मिलने कि
या पतंगे में थी जलकर मिटने की.
या फिर
उस विजयी अश्व में थी ,
अंतिम छोर तक पहुच जाने की
जो लगन सूर्य में थी
सुबह सुबह 
पूरब को अपनाने की.







फैला चुका 
सूर्य अब वो गुलाबी रंग,
छितिज़ पर नजर आई धूल 
मुझे.
भटक गई
थी नदिया बाढ़ में तो क्या?
मिलना तो प्रशांत से ही 
था.


 देखी होगी तूने
ना जाने कितनी असफलताए
एक जीत ये 
तेरी,
 सारा
भार उठाने जा रही है
डंका बजेगा अब तेरा भी
नाचेंगे सब तेरी धुन पर,
थिरकेंगे हजारो पैर
तेरे ही संगीत पर
और बजेगा 
डंका तेरा
तेरे ढंका तेरा 
पुरे शहर में.










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