बुधवार, अगस्त 24



नादाँ थे हम,जो बेफिक्र बैठे थे,
जब बोये जिंदगी भर फूल है
तो कांटे क्यों काटेगे?

ग़लतफ़हमी थी हमारी "गुंजन",
यहा अपनों का बोया भी काटना
पड़ता है!-----------G.J

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वक़्त का बदलता रूप तो देखो "गुंजन"
वो बात करने लायक नहीं समझते आज
जो कभी हमराह कहा करते थे!!!
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मैंने कब कहा उनसे कोई गिला नहीं है!
मगर बात कुछ ऐसी है  "गुंजन",
जब-जब देखा आँखों में उनकी,
सच का सैलाब नजर आ गया!
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सोमवार, अगस्त 22

अबके जब तू आएगा!


कान्हा ,
अबके कजरारी रात में जब तू आएगा!
64 बरस पुराना तम,
तब तू न देख पायेगा!
मोमबतियां, मशाले जलेंगी,
हर गली-नुक्कड़ पर !
हर और उजियारा छा जायेगा!

कलयुग में इंसानियत का नाम 
मिट जायेगा,
तेरे कथन को झुठलाकर
जन जब एक स्वर में
आवाज उठाएगा,
तब तू भी चकित रह जायेगा!
कान्हा,

अबके कजरारी रात में जब तू आएगा!

तेरी जन्मभूमि के लिए
जब इंसान को भूखा सोता देखेगा,
तब तू भी अश्रु बहायेगा!
तेरे माटी के खिलोनो को
हे दयावान!
तू स्वयं सराहेगा!
कान्हा,
अबके कजरारी रात में जब तू आएगा!

तैयारी हो गई तुझे बुलाने की,
माँ भारती को,
फिर से पवित्र बनाने की,
तू जब
छली, कपटी लोगो पर
अपना चक्र चलाएगा,
कचरा बीनती तेरी गय्या माँ
को तब चारा मिलने लग जायेगा!
एक बार फिर सारा
भारत कान्हा-कान्हा
हो जायेगा!
कान्हा,
अबके कजरारी रात में जब तू आएगा!

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मंगलवार, अगस्त 9

मेरी बरात

 कल रात मेरी अंखियों ने कहा मुझसे ,
अब नींद अच्छी नहीं लगती है ,
रस्ते बहुतेरे हैं , 
ढूँढना है मंजिल किस छोर पर सजती है!

मुझे इंतज़ार मिलन की बेला का है,
नगाड़े बजेगे सब ओर,
नाचेगे अपने भी उस धुन पर ,

देखना है ये,
हाथो में फूलों की माला लिए वो 
कब मेरा अभिनन्दन करती है?

अभी न निंदिया को बुलाना तू ,
ज़रा मिलन तक तो रुक जाना ,
मैं चुन लूँ राह वो,
जिससे बरातें निकलती हैं!

कल रात मेरी अंखियों ने कहा मुझसे ,
अब नींद अच्छी नहीं लगती है ,
रस्ते बहुतेरे हैं , 
ढूँढना है मंजिल किस छोर पर सजती है!


विजयी भवः
गुन्जन  

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गुरुवार, अगस्त 4

कई परते चढ़ आई थी
छोटे बीज पर दुनिया कि धुल की,
आज बारिश में सब धुल गया ,
सुना है जल्दी ही नया पौधा आने वाला है!