बुधवार, अक्टूबर 17

अथाह प्रेम

'ऊँची गहरी साजिशें करता कोई,
सहमा सा बस जलता कोई..
प्रेम को अपनाने की जिद में,
कंधो पर प्यार लिये,
रात भर डरता कोई....'

"प्रेम अपनाने से क्या होगा?
क्या पाया वही प्रेम होगा?
जलते तो यूँ भी हो,
उसको पाकर सिमटता ही हर कोई..."


'अथाह तो होगा ही,
समंदर की तरह...
गहरे में उतरकर.
जल में डूब कर ही तरता कोई..'

"समंदर तो खारा ठहरा,
प्यासे ही रह जाना है..
तरता तो गंगा में है..
उसी तट पर रमता कोई..."

'मुझे बस पाना है..
पाकर ही सजता कोई..
उसे हासिल करना है ,
उसी के लिए जीता कोई...'

"अपनाओगे कैसे?
बस पाने के लिए इतनी जलन?
पीकर ही जल सकता कोई..
अपनाकर ही खो सकता कोई..."

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घर की छत का अहसास...

मेरे घर की छत का अहसास...
हर शाम दिन का हिसाब करती इच्छाओं की आवाज़...

कहीं कुछ छूटा तो नहीं,
क्या खोजा आज..
सिरहन करती आवाजे,
क्या कुछ मेरे पास..

मेरे घर की छत का अहसास...
हर शाम दिन का हिसाब करती इच्छाओं की आवाज़...

कल की बिमारियों की पर्ची,
कल के सारे परहेज के साथ...
खुलते लालच को बांधती मैं..
कैसे बचाई जाए लाज..

मेरे घर की छत का अहसास...
हर शाम दिन का हिसाब करती इच्छाओं की आवाज़...

प्रेम की खोज को निकल पड़ता एक भाग,
दूर घाटी , ऊँचे आकाश....
करती इंतज़ार उसका रोज,
बुढा हो लौटता वो निराश..

मेरे घर की छत का अहसास...
हर शाम दिन का हिसाब करती इच्छाओं की आवाज़...

होड़ ही करनी है उम्र भर,
जीते जी , चलती साँस...
हिसाब लगाना जी पड़ता...
कितनी बाकी है अब प्यास.....

मेरे घर की छत का अहसास...
हर शाम दिन का हिसाब करती इच्छाओं की आवाज़...

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रविवार, अक्टूबर 7

बशर्ते तुम मुझे अपना कहो...



बशर्ते तुम मुझे अपना कहो...
वीरानियों में मेरी तन्हाई से ज्यादा,
तुम मेरे करीब रहो..

बशर्ते तुम मेरे अहसासों का जमीर बनो...
मेरी लाल रक्त धाराओं में बहते लहू की गति को,
घटता-बढ़ता तुम देख सको..

मैं तैयार हूँ,
तुम्हारे कदमो का निशाँ बनने को,


तुम्हारे माथे का तेज बनकर,
तुम्हारी आखो में चमकने को....

बशर्ते धरती से एक तार इलास्टिक का,
जो कम ज्यादा होता हो..
जोड़े रखे मुझे तुमसे..
मेरी गलतियों पर,
उन नतीजों से
वाकिफ करवा सको..

मैं तैयार हूँ,
तुम्हारी जड़ो की माटी बनकर
तुम्हें बांधे रखने को..
तुम्हारे ऊपर बदली बनकर ,
तुम्हें पानी देने को..

बशर्ते तुम सुर दो मेरे संगीत को,
हर शाम मेरे बालों में गजरा
सजाने का वादा करो...

तो, मैं तैयार हूँ..
तुम्हारे नाम के आगे ,
अपना नाम लगाने को,..
मैं तैयार हूँ,
तुम्हारा उम्र भर साथ निभाने को....

@गुंज झाझरिया..

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बुधवार, अक्टूबर 3

महोब्बत को जिन्दा रखो

इन उठती-गिरती हवाओं को बस में करना है तो???

अपनी महोब्बत को जिन्दा रखो..
अपने जिगर में सांसे रखो..
अपनी रूह में जान रखो...

इन उठती-गिरती हवाओं को बस में करना है तो???

आसमान तले ईमान रखो..
भूमि पर सार रखो....
जल में बहता भाव रखो..

इन उठती-गिरती हवाओं को बस में करना है तो???

स्वयं पर विश्वास रखो..
उँगलियों में तलवार रखो..
जिव्हा पर तार रखो...

इन उठती-गिरती हवाओं को बस में करना है तो???
अपनी महोब्बत को जिन्दा रखो........

@गुंजन झाझरिया 

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मंगलवार, अक्टूबर 2

"वक्त नहीं रुकता"




जब गुजरती थी हवा तुझसे होकर,
वो हवा कुछ ताज़ा सी हो जाती थी..
खिल जाते थे फूल आंगन के,
महक जाती थी मैं भी..

सुना है, वक्त नहीं रुकता!
मेरा वक्त तो वहीँ रुका है!!

ना आंगन के फूलों की सुबह हुई,
ना पत्ते हिले, ना हवा महकी...
अभी दूर तेरी मुस्कुराती आंखें दिखी..
तेरी लंबी पदचाप सुनी...

सुना है, वक्त नहीं रुकता!
मेरा वक्त तो वहीँ रुका है!!

वो गुलाब के फूल, 
जिनमे जिंदगी नज़र आती थी..
आज सूख गए हैं..
सारे वादे-इरादे अब भी साथ हैं..

सुना है, वक्त नहीं रुकता!
मेरा वक्त तो वहीँ रुका है!!

वो चाबी का छल्ला, और दरवाजे के घंटी...
रूह को छू कर गयी हर मुलाकात..
जाते समय जोर से की दरवाजे वाली आवाज़.
सब कुछ तो पास है....

सुना है, वक्त नहीं रुकता!
मेरा वक्त तो वहीँ रुका है!!
उतना ही ताज़ा और खास है...
वही कुछ खो देने का...
सब कुछ पा लेने का अहसास है!!!!
गुंजन झाझारिया

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