रविवार, जुलाई 29

काश ऐसा भी कोई चूरन होता


काश ऐसा भी कोई चूरन होता जो ,
संकीर्ण मानसिकता का इलाज़ करता..
रोते-रोते इंसान को हंसा जाता,,
जिंदगी की मिठास को चखा जाता..
बिकता खूब धूम-धाम से,
जो एक मुस्कान का मोल बता जाता..

काश ऐसा भी कोई चूरन होता जो,
चोरी, सीनाजोरी को बेकार कह जाता..
झूठ के कीड़े से लड़ता,
स्रष्टि का ध्येय बता जाता..
होगी तब विज्ञानं की पूजा,
वो इंसानियत जगा जाता..

copyright@ गुंजन झाझरिया "गुंज"

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शनिवार, जुलाई 21

शोहरत

सूर्य से पहले आँखों की पुतली खोले.
पहली ही किरण से मिला कर नजरें,

इरादों के भाव तोले.
शुन्य में भी जो करोड टटोले,
उसे मिलती है, शोहरत ...

जो ठोकरें सहेजता हो,
तन को निचोड़, मन मरोड़ता हो,
निंद्रा में जीत का अहसास,
जिसके रोंगटे खड़े करता हो..
उसे मिलती है, शोहरत..

भीड़ में जो अपनी छवि देखता हो,,
कर्म को पूजा, लक्ष्य को धर्म कहता हो,
ऊँचाइयों में संभलना जानता हो,
सुगंध के जैसे फैलता हो,
उसे मिलती है शोहरत..


हवा की सर-२ में जिसे संगीत सुनाई दे..
आधे भरे गिलास में आधा पानी दिखाई दे..
कुछ कर गुजरने की जिस पर हो धुन सवार ,
उसे मिलती है शोहरत..


मरते बहुत हैं इसकी उडानों पर,
कटते बहुत हैं, इसकी चट्टानों पर..
हल जैसे जुतते हैं,
ऊन के जैसे बुनते हैं..

जिसे मुस्कुराकर ,
बिना थमे चलने की आदत हो..
ना मदद लिए बढ़ने की हिम्मत हो..
खुद को खुदा कहे जो,
उसे मिलती है शोहरत..
copyright @गुंज झाझरिया 

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शुक्रवार, जुलाई 20

तेरी मेहनत नए आयाम छु जायेगी

अधरों पर एक मुस्कान छुट जायेगी..
सपनो में तेरे नयी जान फूंक जायेगी..
तू चलते रहना राही,
तेरी मेहनत नए आयाम छु जायेगी..

बैठना नहीं इंतज़ार की छांव में तुझको,
जलना तपिश में,
बरसात में बहना होगा..
जब सारी ठिठुरन तेरी रंगों में उतर आएगी..
तेरी मेहनत नए आयाम छु जायेगी..

यह एक दौड है साबित करने की..
दुनिया को पीछे छोड,
आगे निकलने की..
सबके दिलो में जब तेरी छाप छुट जायेगी..
तेरी मेहनत नए आयाम छु जायेगी...
Copyright @गुंज झाझरिया

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मंगलवार, जुलाई 17

करवा अपनी जय

अनभिज्ञ रहे अभिमन्यु, चक्रव्यूह तोड़ने के राज से,
भूल गए थे हनुमत शक्ति सारी, एक छोटे से श्राप से..
अर्जुन भी भावुक हुए, अपनों संग युद्ध के विचार से..
प्रभु राम भी बिलखे थे, सीता के ख्याल से..
ना तुझसे भूल हो ,ना तू भूले,,
ना रोये, ना ही सिसके किसी भी हार से..
ये कैसे सोच लिया तुने,

तेरा लहू ना बहे किसी पत्थर के वार से...
बहना, गिरना, सब होता है चलने की रफ़्तार से..
समय ना गंवाना, खुद पर सवालों की बौछार से..
तू शक्ति है..तू भी जाने है सारे भेद..
खोल अपना तीसरा चक्षु, बचा खुद को अंधेरो के प्रहार से...
आँख पर ध्यान लगा, भरा भण्डार खोल दिखाना होगा..
सारी ताकत लगा, जुट जा जी-जान से...
उठ खड़ा हो, करवा अपनी जय जय सारे संसार से..
गूंज झाझरिया 

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शुक्रवार, जुलाई 13

तू बरसता जा..


भरता जा नमी तू भीतर,
अंदर गुब्बार तू बनता जा,
चाहे गरज, चाहे चमक..
हर बार तू बरसता जा...
जो गरजे, वो बरसे नहीं
दुनिया की इस रीत से परे..
तूफ़ान सा तू उठता जा..
आंधियां लिए आगे, पीछे..
बेख़ौफ़ तू निकलता जा..
कोई रोक ना सकेगा तुझे अब,
वहम ऐसे लोगों में भरता जा..

नाहक तू दुखी हुआ,
नाहक ही तू सिसका था,,,
नाहक तुने पाली दुविधा,
हीरे जैसी चमक को तुने
नाहक तिजोरी में बाँधा था..

सन्नाटों से,विरानो से,
तपन, ठिठुरन से कर यारी..
निकल धरती से,
आसमान में उठता जा...
ज्वालामुखी क्या है तेरे आगे...
अपनी आग उगलता जा...
पक्षी डरे कि पेड़ गिरे,
ना कर उनकी चिंता,
सब साजिशों से बस निकलता जा..

भरता जा नमी तू भीतर,
अंदर गुब्बार तू बनता जा,
चाहे गरज, चाहे चमक..
हर बार तू बरसता जा...

copyright गुंज झाझारिया
 

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बुधवार, जुलाई 4

मैं सचमुच स्तब्ध हूँ


हाँ तो क्या कह रहे थे तुम,
कि अब समय नहीं दे पाओगे?
ऐसे प्रेम की चाह तो मुझे कतई न थी!
इतने अरमान ही क्यों सजाये?
प्रिये.
मैं सचमुच स्तब्ध हूँ तुम्हारी इन बातो से..
प्रेम जैसे असीमित आकाश को कैसे बांधती??
अगर कोई प्रेम में होकर,
साथी के संग अपने भविष्य की कल्पना न करे,
 कुछ शब्द प्रेम के न सुने,
हफ्तों बाद साथ मिला पूरा दिन भी कम न लगे,
तो क्या तुम उसे प्रेम का दर्जा दोगे?
अब भी मैंने तुम्हारी भावनाओं पर सवाल नहीं उठाये हैं..
जब इंतज़ार ही करना है तो
अलग होकर करने में मज़ा है..
तुम्हारे होते हुए इंतज़ार करना मुझे नहीं भाता,
तुम साथ रहोगे.
मैं और सपने बुनुंगी,
मेरे अंदर के उठते वेग को कैसे संभालोगे?
शिकायतों का दौर बढ़ता जाएगा..
मेरा प्रेम तुम्हें बस इच्छाओं का दरिया नजर आएगा..
जब तक तुम इन बातों में बुद्धि लगाओगे,
अहसासों के पेट्रोल पर चलने वाली गाड़ी कैसे आगे बढ़ेगी,
जानते हो तुम, मेरे अंदर उथल-पुथल मची है,
फिर शांत कैसे रह सकते हो?
जब गिरने लगती हूँ,
क्यों अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाते हो?
अब क्या सिर्फ मैं ही बोलूंगी?
तुम तो कुछ बोलो.
या  अब भी अपना दिमाग लगा रहे हो?
क्या बोलना उचित है, क्या नहीं?
अगर मैं गलत हूँ तो सही बतलाओ,
या फिर ये तुम्हारा अहम है ?
हाँ, अहम ही तो है..
तुमने कहा है अलग होने को,
जाओ रहो अलग..
मैं भी देखता हूँ, कैसे रहोगी मेरे बिना..
मैं तो सुकून से ही जीऊँगी ,
समर्पण तो मैंने जान ही लिया है..
आखिरी बातों में भी मेरा अहम आड़े नहीं आया..
इंतज़ार करुँगी उस दिन का,
जब तुम इस गाड़ी में एक बार फिर पेट्रोल भरोगे,
जैसे आरम्भ में भरा था,
काफी मीलों तक कैसे बिना रुके चली थी !!!!

गुंज झाझारिया copyright..

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मंगलवार, जुलाई 3

याद करने का वक्त कहाँ से लाते हो?

तुम कहते हो, मुझे याद तो करते हो पर वक्त नहीं मिलता...
बात करने का वक्त नहीं तो याद करने का कहाँ से लाते हो?

मेरी यादो पर तो कम से कम मेरा हक है,
वो कब आती जाती हैं, ये मुझे क्यों नहीं बताते हो?

अब इसे भी हिसाब का नाम न देना,
वरना लोग कहेंगे, कैसा प्रेम जताते हो?

हाँ, जानती हूँ, लोगो की परवाह नही तुमको,
किन्तु फिर मेरी बातो से क्यों तिलमिलाते हो?

गिनाती नहीं हूँ कि मैं ज्यादा चाहती हूँ और तुम कम,
क्यों, मेरी इच्छाओ को बेमतलब का कह जाते हो?

क्या सोचते हो, मुझे परवाह नहीं तुम्हारी तरक्की की?
ऐसा नहीं है तो क्यों हरदम,
तुम समझती नहीं का पाठ सुनाते हो?

मैं भी वही कहती हूँ, जो मुमकिन हो..
तुम ही दुनिया के सबसे व्यस्त इंसान हो,
क्यों हर बात पर यही जताते हो?

कहते हो दुनिया से, मैं जन्म-जन्मांतर का साथी हूँ इसका,
क्यों मेरी नींद को बस एक "मैसेज" के भरोसे छोड जाते हो?

तुम कहते हो, मुझे याद करते हो पर वक्त नहीं मिलता...
बात करने का वक्त नहीं तो याद करने का कहाँ से लाते हो?
© गुंज झाझारिया

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उलझन

उलझती चोटी के बालों में उलझने,
साँसे भरती रात दिन..
अंदर-अंदर कुढती रहती,
करती विश्वास को छीण-छीण,
अविरल वेग से दौड़ती नसों में,
हर छोटी बात पकड़ ले जाती..
दीमक के जैसे ये उलझने,
खोखले अस्तित्व की जन्मदाता बनती.
साये के जैसे साथ रहती हरदम,
डर के भावों से प्रेम दिखलाती.
काया को निढाल करती..
दिखने लगती माथे पर झुर्रियाँ,
जो ये ज्यादा साथ देती...
जंगल के नागराज के जैसे,
सर-सर सर से पांव रेंगती उलझने!
कुछ नहीं है इनके पास,
देने और खिलाने को..
ये बस आदम का रक्त पीते जाती..
काट फेंको इनकी जड़ो को,
दे दो इनको आजादी..
उलझती चोटी के बालों में उलझने,
साँसे भरती रात दिन..
@copyright गुंज झाझारिया

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मैं एक छोटी सी चिड़िया

इतनी सारी आबादी में,
मैं एक छोटी सी चिड़िया हूँ..
मन में प्यार लिए डोलूं,
मैं आंगन की बिटिया हूँ...
मुस्कराहट गुँथी है माँ की,
मेरी चुटिया में...
मैं बाबा का प्यारी मुनिया हूँ...
रौनक बनती हूँ दीवारों की,
मैं तीज-त्यौहार की फर्रियां हूँ..
भाई-भतीजे अधूरे बिन मेरे,
मैं भाभी के साज की डिबियाँ हूँ..

इतनी सारी आबादी में,
मैं एक छोटी सी चिड़िया हूँ..

घर की छोडो, मोहल्ले की सुनो..
सुबह सवेरे देंखे सब जो ,
मैं उस ललाई की मुखिया हूँ..
पड़ोस की दादी जब चल नहीं पाती.
मैं ही उनका चीटिया हूँ..
सबको इज्ज़त-सम्मान बाँटती,
मैं खुशियों की पुडिया हूँ...

इतनी सारी आबादी में,
मैं एक छोटी सी चिड़िया हूँ..

दिन भर अकेली डोलू मैं,
सखियाँ नहीं हैं मेरे पास..
मैं मोहल्ले की इकलोती गुडिया हूँ..
कब आएगी मेरे साथ खेलने वाली?
मैं अकेली सोनचिरैया हूँ..
न मारो बेटियों को मोहल्लेवालो ..
पूछो माँ-बाबा से,
कितनी अनमोल हूँ मैं..
वो कहते हैं..
मैं पाप धोने वाली टिकिया हूँ...
इतनी सारी आबादी में,
मैं एक छोटी सी चिड़िया हूँ..
मुस्कराहट गुँथी है माँ की,
मेरी चुटिया में...
मैं बाबा का प्यारी मुनिया हूँ..
मन में प्यार लिए डोलूं,
मैं आंगन की बिटिया हूँ...
copyright© गुंज झाझारिया 

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मैं नारी हूँ..

मैं नारी हूँ..
खुद में छुपाये प्रकृति के हजारों राज..
शिकायत है तुम्हारी कि,
तुम मुझे समझ नहीं पाते,
क्या चाहती हूँ मैं?
कभी तुम्हारे खिलते नयनो ने,,,
कभी तुम्हारे मुख के उगले लावे ने,,,
कहाँ मुझे समझाने का अवसर दिया?
बरसों से बंद पड़ी कोठरी में गर्द लगी हुए,
मेरे स्वरुप से अब पुरानी महक आने लगी है!
तुम्हे, तुम्हारी दुनिया में रंग भरने का जिम्मा था,
किन्तु अब प्रतीत होता है
कि तुम्हे रंगों से कोई लगाव नहीं...
अपनी आँखों में अथाह सागर लिए,
भीतर धरती सिमटाये,
जिव्हा पर बिजली की रौशनी
गर्जना के साथ सजाये..
सारी ऋतुओं को अपना गहना बनाये..
मैं नारी हूँ.
तुम अगर बनाने वाले हो,
मैं सहेजने वाली..
तुम अगर गिरने-गिराने वाले हो,
मैं तत्पर हूँ,उठाने वाली हूँ ...
युग दर युग बीतते गए,
तेरे अंदर का दानव बड़ा होता गया..
वैसे तुझमे मुझे समझने का भाव मिटता गया.
सम्मान, शर्म, विश्वास, और भावनाओं के द्वार बंद कर,
तू खुद को स्रष्टि का रचियता समझ बैठा..
अरे ! कितना और बिगादोगे इंसानी रूप को..
अब छोड दो अपने अहम को..और आओ ..
दोनों साथ मिलकर बिखरा हुआ समेटते हैं..
ऐसा नहीं की मैं अकेली काबिल नहीं ..
पर अभी भी मेरे अंदर सामंजस्य, और श्रद्धा है तुम्हारे प्रति..
तुम जब जब बिखरा उठाओगे
खुद क्यों बिखेरा..इसके लिए पछताओगे ..
मैं चाहती हूँ तुम सीखो ..तुम समझो, उठो और संभलो...
फिर अगले ही पल गिरने से ज्यादा चोट न आये,
सोचकर हाथ बनता देती हूँ..
मैं नारी हूँ..
खुद में छुपाये प्रकृति के हजारों राज..
शिकायत है तुम्हारी कि,
तुम मुझे समझ नहीं पाते मुझे ,
क्या चाहती हूँ मैं?
मैं चाहती हूँ तुम सीखो ..तुम समझो, उठो और संभलो...
फिर अगले ही पल गिरने से ज्यादा चोट न आये,
सोचकर हाथ बनता देती हूँ..
मैं नारी हूँ..

copyright गूंज झाझरिया 

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मैं मुआ

आँखों में हल्की सी नींदे..
स्वप्न ओझल हो गए..
आंखे मसलकर देखा..
पैर चादर के बाहर सो रहे,,
पास उम्मीदों की तख्ती पर,
बाल बच्चे लेटे हुए..
उठ खड़ा हुआ चौंक कर..
माथे से बूंदें झर झर गिरें..
आज तो स्कूल खुल जाएगा..
बड़े वाले को दाखिला कैसे मिले?
बचाया भी बहुत साल भर में..
इतने पैसे नहीं जुटे.
वो साहब तो कुर्सी पर बैठे रहते,
मेरा तन बैल सा जूते,
फिर भी न कमाता उतना,
जाने मालिक कैसा हिसाब करे..
हड्डी हड्डी हो गया शरीर लुगाई का..
कैसे इसकी सेहत बने..
मैं मुआ न गलत काम किया,
पैदा होने से अब तक बस
मालिकों को सलाम किया..
फिर भी मुझ गरीब की कौन सुने..
जो होती है कीमत सामान की,
उसमे भी जाने क्या 'टकस' जुड़े.
मैं क्या जानू स्वाद इस जीवन का,
यहाँ पेट काट काट कर भूख मिटे..
मैं मजदूर,
मेरी चिंता कौन करे....
copyright. गुंज झाझारिया

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