दरवाजे की कुण्डी खोल, सफर शुरू किया सुबह का
सड़क तक पहुची, तब तक सब रंग चुका था,
मेरे कपड़ो पर कीचड़ का बादल..
मेरे सपनो में भविष्य का भारत..
उस स्कूल जाते भविष्य को देख..
चटक रंग जो भर डाले थे ,
सड़क तक आकर रंग धुलने वो..
कीचड का बादल सुखकर गिर पड़ा..
नजर टिकाई सामने वाली महिला पर..
मैले, कुचेले कपड़ो में..
भीख मांगी रोटी खिला रही थी वो ,
मेरे देश के भविष्य को..
जी में आया कहू उससे,
क्यों भविष्य को वर्तमान में ही बिगाड़ रही हो?
मेरे भविष्य के भारत पर दाग लगा रही हो?
क्या कहती, किस मुंह से कहती..
भला हो उसका, मांग कर ही खिला दिया..
और फीके पड़ जाते रंग वो ..
केसरिया-सफ़ेद-हरे वाले...
जो भूखा रह जाता,
मेरे देश का भविष्य ...
गुंजन झाझारिया "गुंज"
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