गुरुवार, अगस्त 30

मेरे देश का भविष्य ...


दरवाजे की कुण्डी खोल, सफर शुरू किया सुबह का
सड़क तक पहुची, तब तक सब रंग चुका था,
मेरे कपड़ो पर कीचड़ का बादल..
मेरे सपनो में भविष्य का भारत..
उस स्कूल जाते भविष्य को देख..
चटक रंग जो भर डाले थे ,
सड़क तक आकर रंग धुलने वो..
कीचड का बादल सुखकर गिर पड़ा..
नजर टिकाई सामने वाली महिला पर..
मैले, कुचेले कपड़ो में..
भीख मांगी रोटी खिला रही थी वो ,
मेरे देश के भविष्य को..
जी में आया कहू उससे,
क्यों भविष्य को वर्तमान में ही बिगाड़ रही हो?
मेरे भविष्य के भारत पर दाग लगा रही हो?
क्या कहती, किस मुंह से कहती..
भला हो उसका, मांग कर ही खिला दिया..
और फीके पड़ जाते रंग वो ..
केसरिया-सफ़ेद-हरे वाले...
जो भूखा रह जाता,
मेरे देश का भविष्य ...
गुंजन झाझारिया "गुंज"

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शुक्रवार, अगस्त 24




स्वप्न के धरातल पर चाहे जितने कंकड आयें..
मुझे बस चलते जाना है..
सुना है कहीं दूर, इसी राह पर परियों से सामना होता है...
मुझे बस चलते जाना है....

copyright-गूंज झाझारिया 

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खुरचे पत्थर भगवान बने,
रेत के टीलो से इंसान बने..
जो हो जूनून कर गुजरने का,
ठोकर भी सम्मान बने..
copyright Gunj Jhajharia

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हाथ जोड़कर प्रणाम करें, 

पैर पड़कर नमन करे..
ना भाए कोई भी सम्मान,
जब अभिवादन दिल से कोई ना करे...:)

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भीतर-२ एक लौ जल रही थी बरसो से,
आज उसकी रौशनी चहुँ ओर चमकती दिखाई दी..
अपने जैसा ही संसार को पाया मैंने...
दुनिया मेरी परछाई सी बनती दिखाई दी..:)
copyright-गुंज झाझारिया

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ना "बस काटना" है तुम्हें, ना अंधेरों में खोने देंगे..
यूँ ना टुकडो में बिखरेंगे तुमको-ए-जिंदगी,
तुम्हें मुस्कुराहटो पर सजा कर रखना है....:)

copyright-गुंजन झाझारिया "गुंज"

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दिल को ऊँचाइयाँ बहुत भाती हैं..
हम हैं कि उसे गुलाम बनाये फिरते हैं....!
ना उड़ने देते. ना झूमने देते ..
उसे किसी और के लिए पैगाम बनाए फिरते हैं..!!



                                                            copyright-गुंजन झाझारिया "गुंज"

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बैचैनी वाला इंतज़ार


क्या तुमने इंतज़ार किया है इतना कभी?
सावन की पहली फुहार में भी,
उसके अगले बरस लौट आने का इंतज़ार होता है ..
जो है हाथ में उसे ही पाने का इंतज़ार होता है.
जो रात दिन आपके इर्द-गिर्द चक्कर काटता है, 

उससे मिलन का इंतज़ार होता है..


जो चीज़ आपके पास है,
उसका भला कोई इंतज़ार होता है?
जी..होता है..
सबसे अदभुत, और बैचैनी वाला इंतज़ार होता है..
रात-दिन भीतर उगने और बढ़ने वाले घास जैसा होता है..
पहले लगे तो खाद दे.बाद लगे तो फसल बिगाड दे..
ऐसा इंतज़ार होता है!

उम्मीद के दरख्तों पर उगती डालियाँ होती हैं..
दूर का क्षितिज भी मिलन दर्शाता है..
भरी दोपहरी में उस प्यासे को,
चंद कदमो दूर पानी नजर आता है..
जब चाय का प्याला हाथ में हो,
उसके हाथ की चाय का इंतज़ार होता है...
कितने ही अबोध मन से घिरे रहो,
उसके तुतलाने का इंतज़ार होता है..

अब समझे?
ये कौनसा इंतज़ार होता है?
बोलो अब?
क्या कभी तुम्हें बैचैन करने वाला,
इंतज़ार तुम्हारा होता है?

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एकला हिमालय




जो हिला नहीं, अटल रहा..
जो खड़ा रहा, बना रहा..
जो डटा रहा, तना रहा..
तूफानो में, जो टिका रहा...
वो हिमालय भी एकला जी रहा ....



जिसको मिटा दिया,
जो हिल रहा, मिल रहा..
जो झुक रहा, सह रहा.
जो गिर रहा, बह रहा..
वो वृक्ष झुंडो में पल रहा....

सर्वस्व छोड एकला चल रहा..
इतनी ऊंचाई पर एकला ही रह रहा..
फिर क्या करना वहाँ जाकर,
जब ऊपर से नहीं कोई दिख रहा...

तरसे नयना, अश्रु बह रहा .
बिछडो को याद कर,
अपनी ही ऊंचाई से
जल रहा...

अंत समय एकला बीत रहा ..
कोई भी समीप ना आ रहा ..
ऊँचा है तू मुझसे..
कहकर हर कोई चिढा रहा..

देखो एकला ही घुट रहा,
एकला हूँ जप रहा..
वो हिमालय ..
एकला एकला मर रहा..

बनना है तो वृक्ष बनो,
हर साँस ये कह रहा...
जो गिरता रहा, उठता रहा...
एक मौसम फल से झुकता..
अगले मौसम फूलो सा खिलता रहा..
अपनों संग बांटी पूँजी सारी,
हर कोई उसको सींचता रहा..

वो देखो वृक्ष झुंडो में पल रहा.....
copyright गुंजन झाझारिया "गुंज"

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युवा नसे



हौसलों की कलम से नयी किताब लिखेंगे..
खौलते लहू से हम लाजवाब लिखेंगे..
हम युवा नसे हैं,
रग रग में गुलाब लिखेंगे...


सुबह के सूरज की आब लिखेंगे..
आँखों में टपकता शवाब लिखेंगे..
गहराई और ऊँचाई के साथ,
समतल का भी हिसाब लिखंगे..

धरती क्या, क्या अम्बर,
ब्रमांड के सवालो का जवाब लिखेंगे,
गुलशन को आफताब लिखेंगे,
ना घटा कभी,
ना घट सकता..
ऐसा इतिहास लिखेंगे.

हौसलों की कलम से नयी किताब लिखेंगे..
खौलते लहू से हम लाजवाब लिखेंगे..
हम युवा नसे हैं,
नस-नस में गुलाब लिखेंगे...
गुंजन झाझारिया "गुंज"


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मंगलवार, अगस्त 7

उलझनों के पीछे का सच...


सब उलझनों के पीछे का सच
ऐसा सच जिससे कोई वाकिफ नहीं..
बिलकुल सफ़ेद वस्त्र जैसे,
जिस पर कोई दाग नहीं..

ये कौनसा सच ?

सच तो सच्चाई है..
जिससे कोई अनजान नहीं..
फिर ये क्या बला है..
जिसका किसी को ज्ञान नहीं..

अरे ये अविश्वास है,
ये किसी रौशनी का प्रकार नहीं..
खुद पर उठाया सवाल है..
यह कोई तलवार नहीं..

सच की धार ज्यादा है..
फिर ये कैसा सच का सत्य ?
जिसका कोई आर-पार नहीं ..

अन्धकार का साथी है,
पर झूठ नहीं..
है सच यही ...
पर सच्चा नहीं....

भागना दूर खुद पर चलाये तीर से है..
उलझनों से कोई भय नहीं..
लड़ना तो भीतर से है..
बाहर कोई क्षय नहीं..

उम्मीद की थाम कलाई चलना है..
सच का कोई घर नहीं...
खुद को काबिल करना है..
वरना बीमारियों का कोई अंत नहीं..

सब उलझनों के पीछे का सच
ऐसा सच जिससे कोई वाकिफ नहीं..
बिलकुल सफ़ेद वस्त्र जैसे,
जिस पर कोई दाग नहीं..

copyright गुंजन झाझारिया "गुंज"
 

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