शनिवार, सितंबर 29

गरम गरम ख्याल

वक्त बेवक्त ताज़ा गरम गरम..
जो ख्याल आते जाते हैं.!
महसूस करके देखो साथी..
वही आपका वजूद बनाते हैं!

नहीं फर्क पड़ता है,
जीवन काल कितना है उनका!
कुछ ही क्षण में,
किस्मते बदल जाते हैं!

उठापटक कर,
अच्छे से नापतौल कर लेना..
वो लगते हल्के रुई जैसे,
आँसू टपके तो भारी हो जाते हैं!

क्षण क्षण रखना हिसाब...
पाई पाई से महल खड़े हो जाते हैं!
दरबान बनके रखना निगरानी,
साजिश कर बुधि हक जमाते हैं!

वक्त बेवक्त ताज़ा गरम गरम..
जो ख्याल आते जाते हैं.!
महसूस करके देखो साथी..
वही आपका वजूद बनाते हैं!
copyright @गुंजन झाझरिया 






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एक पतली डोरी/
एक छोटी सी गांठ/
एक हिस्से तुम/ 
एक हिस्सा मेरे नाम/
कहे लोग गांठ लगे तो मन मैला हो जाय/
कहू मैं/
जो बीच हमारे धागा ही ना रह जाय/
इधर तुम पकडे चले आओ/
उधर मैं खिची चली आऊ/
मिल जायेंगे जहाँ गाँठन रह जाय..
छोड धागे को एक हो जाएँ/
ना धागा टूटे, ना गांठ की फिक्र सताए/
धागा तो बस मिलन की राह दिखाए/
प्रेम हो जाए इतना हरा...
गाँठन छोड डोरी तक की जगह ना रहने पाए/

गुंजन झाझारिया

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गुरुवार, सितंबर 20

घूंट घूंट पीती जिंदगी


तितलियों के पंखों में कैद मुस्कराहट तुम्हारी...
पीछे भागती उसके चाहत हमारी!

जुगनू जैसी रौशनी मे चमकती आंखे तुम्हारी..
छूने उसको पानी में दौड़ती नियत हमारी!

भवरों की गुनगुनाहट में छिपा संगीत तुम्हारा,
"गुंजन" बोल बुनती ख्वाहिशें हमारी!

हरी दूब की ओस में बैठी ठंडक तुम्हारी,
उसे हौले-हौले खुद में उतारती सुबह हमारी!

झरनों के झागों में बनती बाते तुम्हारी,
खिलखिलाकर तैरती दुनिया हमारी!

चाय में अदरक जैसे कड़क आवाज़ तुम्हारी,
उसे घूंट घूंट पीती जिंदगी हमारी!
©  Gunj Jhajharia

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बुधवार, सितंबर 19

गन्नू जी बैठे हो आराम से?


ओम गन गणपतये नमः...

गन्नू जी बैठे हो आराम से?
मसंद और लगाऊ क्या??
लडू तो लायी हूँ,
नमकीन भी मंगवाऊ क्या??
देखो आपकी गज भर की सूंड को,
कैसे इठलाती है..
एक दन्त के ऊपर भी नाच दिखाती हैं..
मैं क्यों कम पाकर भी ना इतराऊ??
गन्नू जी बुधि तो खूब है ,२ बड़े कानो में..
तो दूर से सुन लो ना मेरी बात..

गन्नू जी बैठे हो आराम से?
रिधि सिधि कैसी हैं??
उनके लिए भी दरबार लगाया था..
हर बार कहते हो,
लाऊंगा अगली बार...
अब उनके बिना,
कैसे सजाऊँ मुकुट सोने का??
ऐश्वर्य बिना कैसे जीऊँगी बाप्पा,
आप अपने हिस्से का चाहें दे जाना...


गन्नू जी बैठे हो आराम से?
अच्छा जो भी हो,
इस बरस मुझे कुछ ऐसा दे जाना,,
झप्पर फाड़ दूँ जिससे...
और अगर नहीं दे पाओगे..
तो जाने नहीं दूंगी मैं..
कस कर पकड़ लुंगी अपने साथ..
आप भी रहना मेरे साथ फिर ,
लड्डू तो रोज खिला दूंगी..
बस लड्डू कहाँ से आयेंगे,
वो राह दिखा देना..;)

गन्नू जी बैठे हो आराम से?
थोड़ी सी हरी दूब खिलाऊं क्या?
जो चाहें अभी कह देना...
१० दिन हैं अभी ,,,
चाहें रोज नया भोजन कर लेना..
बस दे जाना ऐसा कुछ..
दुनिया हिला दूँ जिससे....,
जाने से पहले कह जाना ऐसा कुछ,
तारे तोड़ लाऊं कैसे?

गन्नू जी बैठे हो आराम से?
मसंद और लगाऊ क्या??

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रविवार, सितंबर 16

२ हाथ भूसा


स्तब्द निरीह मासूम कातर नयनो से वो देखती,
और फिर चरने लगती ....
प्लास्टिक की थैली, कूड़ा-कचरा...
रोज सुबह-शाम बैठती घर के आगे,,,,
उसके पीछे पूँछ हिलाता वो नन्हा, 
आँखों से टपकता निर् उसके...
नन्हे की मक्खियों को उडाती वो..
गंदगी में बैठी,
गन्दगी चाट चाट कर साफ़ करती वो माँ..
ले गया कोई भूखा दूध का,
नन्हे को पीछे छोड गया,
२ हाथ भूसा बचाने के लिए..
उदास, हतास, वो नन्हा..
अभी तो रोटी भी नहीं खा पाता ..
२ दिन में कचरा चरना सीख गया...
खून जलता देख उसे मेरा..
देखो इंसान कितना गिर गया..
अब देती हूँ टुकड़े रोटी के उसको,
सुबह दोफर शाम दौडकर आता है..
पूरे ४ महीने हो गए ,
अब भी किसी परायी गाय को देख,
उसके पीछे हो जाता है..
खोजता अपनी माँ को ..
फिर उदास लौटकर आ जाता है..
Gunj Jhajharia

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शनिवार, सितंबर 15

रोज सुबह आती है वो काम पर..


बगल में ६ महीने की जान टाँगे,
हाथ में दो लोहे की डंडी लटकाए,
सिर पर आंचल ठहराए..
रोज सुबह आती है वो काम पर..

दोनों डंडियों को गाडकर,
एक आंचल को बांधकर,
रोज एक झूला बनाती है,
२साल की नन्ही को रखवाली बिठाती,
रोज सुबह आती है वो काम पर..

एक थैले में लाती बिस्कुट,
एक बोतल में आधा दूध-आधा पानी,
ना रोता है वो भी, ना तंग करता
लटकते झूले में बस ऊँघता रहता..
रोज सुबह आती है वो काम पर..

२ साल की मासूम भी जानती है बचत करना..
२ बिस्कुट खाकर बाकी को बाद के लिए रखना..
मिट्टी में बैठी कुचली फ्राक को साफ़ करती रहती..
२० साल की उसकी माँ,
रोज सुबह आती है काम पर..

सूखी निगाहों, और भरे योवन से देखती 
सड़क पर स्कूटी चलाती औरतों को,
बच्ची के लिए क्रीम वाला बिस्कुट लाना,
बेटे के लिए काठ का झूला बनवाना..
इसी सपने को बुनती वो..
रोज सुबह आती है काम पर..

पहनती है जिस दिन नया कपडा कोई,
सुडोल- सुंदर शरीर उसका,
रह रह कर आकर्षित करता है..
क्या दोष दूँ उसके पति को??
२२ साल का युवक उसके संग लगा रहता है..
जब रोज सुबह आती है वो काम पर..

बगल में ६ महीने की जान टाँगे,
हाथ में दो लोहे की डंडी लटकाए,
सिर पर आंचल ठहराए..
रोज सुबह आती है वो काम पर..
गुंजन झाझरिया "गुंज"

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बुधवार, सितंबर 12

स्वयं

स्वयं का साथ स्वयं के हाथ..
एक दोस्ती स्वयं का स्वार्थ...
स्वयं की मंजिल..स्वयं की मात..
ना बढ़ सके एक कदम आगे कोई..
लगा स्वयं की घात..
कर स्वयं को बुलंद..पूछ स्वयं की जात...
स्वयं को उठाना है..तोल स्वयं के जज्बात..
सिहर स्वयं की कमजोरी से.
अकेले निकाल स्वयं की बरात..
ना उँगली कर किसी की ढलान पर,
देख स्वयं के हालात...

जीवन को हँसके जीना है..

भुला दे बीते स्वयं की हर बात..

उठ खड़ा हो हर बार ,

चाहे स्वयं को लगे हज़ारो लात..

बना पीछे कारवां अपने...

मिटते-२ भी बना देना स्वयं को खाद..

स्वयं का साथ स्वयं के हाथ..

एक दोस्ती स्वयं का स्वार्थ...


@गुंजन झाझरिया

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मूल्यवान जीवन का सार....

कर वार, उठा हथियार...
सिंह की एक दहाड़,
डराए दर्जनों सियार....

शांत, नन्ही आँखों में..
निंदको को कर शर्मसार..
ऊँची-नीची लहरों पर..
दौड़ा दे नैया को..
पहुँच जा उस-पार..
अकेला निकल इस बार..
सिरहन हो उठे तार-तार..
रख हथेली पर इरादे ऐसे ..
सराहे सारा संसार..
चलते रह, लड़ते रह..
कर अपना खुद प्रचार..
समय बनेगा साथी तेरा,,
धुप छाव भी रहेगे ख्याल..
गीता सार जैसे ,
मूल्यवान हो जायेगा..
तेरे  जीवन का सार....

copyright-गुंज झाझ
रिया 

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मंगलवार, सितंबर 4

वो और होंगे


चुटकियों में बातें उड़ाने वाले कोई और होंगे..
हमें तो बवंडर में भी बाते उड़ाना नहीं आता...

झूठ बोलकर कसम खाने वाले कोई और होंगे..
हमें तो सच बोलकर कसम खाना गंवारा नहीं लगता..

दूसरों की नाकामयाबी पर हसने वाले कोई और होंगे,
हमें तो खुद की कामयाबी पर हँसना नहीं आता..

वो और होंगे,
जो जलते हैं भुट्टे की तरह रात दिन..
हमें तो भुट्टों को जलाना भी नहीं आता...:))

copyright गुंजन झाझारिया "गुंज"

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सोमवार, सितंबर 3

खाकी वर्दी वाला बाबु,,


खाकी वर्दी वाला बाबु,,
एक थैला लटकाए...
हर रोज आता था..
संग लाता था रंग ,
लिफ़ाफ़े में बंद कर...
हर एक दरवाजे पर 
भरी दोपहरी में,
इंतज़ार से जली आँखों में..
गुलाबजल सा वो बाबु...
खुशियों को दूर से गाता था ...
साइकिल पर थैला रखकर पुकारता था ..
अम्मा, आज तो लडू खाऊंगा...
बिजली जैसे पुरे मोहले मे,
सुकून बांटता था बाबु...
सबके सपने लिखता था..
सबकी इच्छाएं पढता था...
वो डाकिया बाबु...
जो सहेज कर रखने को..
एक धरोहर दे जाता था..
अब नहीं आता..
खाकी वर्दी वाला बाबु,,
एक थैला लटकाए...
हर रोज आता था..

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