शुक्रवार, मार्च 28

I'm a River

You are a fountain,
Who knows,
all the directions,
Eye-catching,
Colurful,
Equally flows,
In all the directions,
Still you dnt knw,
How to be in one,
Though,
I am running
just like a river,
Who knows,
Only one direction,
One passion,
knows waiting,
Desire to meet sea,
disapear in the sea,
Yes,
My fountain,
I love my way,
To be ME.....
Yes,
I love to be,
In one direction...
Yes,
I am unaware with rest,
So what,
Its The nature,
I want to go,
Go with the flow....
Yes,
I am a River...
© गुंजन झाझरिया

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पुतला

बाँट दी कद की लम्बाई,
क्यों रहे कोई ऊँचा-नीचा,
या खारा-मीठा,
सबकी चाय में बराबर शक्कर,
मधुमेह मिटने लगेगा,
नीम के पत्ते खाने से अच्छा तला हुआ स्वादिष्ट करेला ही है,
कडवे की सीमा बढ़कर,
जहर बनाती है।
कहाँ है कायदा कानून लिखा,
उस दिन रात चलती प्रकृति का,
चूक नहीं होती किसी क्रियाकलाप में,
क्यों मानव ही गलती दोहराता,
लिख कर रखता है हर नियम,
बाँध देता है संभावनाएं,
तय रहता सबकुछ,
तभी शायद बन जाता है पुतला,
पुतला तो गलती करेगा ही,
कहाँ जान पायेगा तरीका सही,
जान गया कभी,
तो डोर नहीं हिलने देती इंच भी...

उठने-सोने-नहाने-खाने,
यहाँ तक प्रेम जताने,
जताना नहीं प्रेम करने,
और तो और,
प्रेम निभाने,
उससे भी ऊपर,
रोने- मुस्कुराने के लिए,
लदे हैं "बुलेट पॉइंट्स",
घर की दीवारों, फ्रिज, टीवी, मोबाइल्स के भीतर-बाहर,

लगभग तो रोबोट बनाने में सफलता मिल ही गयी,
पर कुछेक प्रतिशत बाकी है,
सौ प्रतिशत परिणाम में।
सही सफल परिणाम आने के बाद,
गलतियों के हजार बार दोहराने का दौर शुरू हो जाएगा।
© गुंजन झाझरिया

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रविवार, मार्च 23

कवयित्री

कवियित्री लिखती है कविताएं,
झोंक देती स्त्रीत्व,
पैदा करती किरदार,
पालती,
भीतर ही भीतर,
अंतः सजाती,
निश्छल सींचती,
उठना-सम्भलना,
सिखलाती,
नारी रंगा चित्र,
मन-मोहक,
प्रेम कर बैठती,
स्वयं निर्मित किरदार से,
ज्ञाता त्याग जानती है,
बांटती बाज़ार में,
पानी का रंगीन बुदबुदा बन,
फूट जाती रचना,
कौन समझा है ,
नारी का त्याग।
मोल नहीं,
अश्रु,
सादगी, उम्मीद का।
मुंह ढक रोती है,
अनमोल किरदार,
बेकार,
न पड़ती,
स्त्रीत्व छाया,
तब नहीं ढूंढता,
काया कोई।
सूजे चक्षुओं से,
बैठती है,
निर्माण को ,
किरदार नया।
इस बार,
नहीं होगा ममता गुलाल,
या होगी,
काया कोमल।
कवयित्री लिखती है,
कविताएं।
© गुंजन झाझारिया

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हाय रे बचपन

मेरा आसमान था,
पुराने कपड़ो की कतरने,
जर लगे झुमके,
फीके रंग वाली चूड़ियाँ,
मोच लगा बर्तन,
सस्ती सी गुड़िया,
20 पैसे का सिक्का,
मिट्टी की गुल्लक
टिफिन भाई का जूठा,
और??

और क्या,
मेरा उड़ना,
उस आसमान में।
::::::::::::::::::::::::
हाय रे बचपन। :)
© गुंजन झाझारिया

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I am not

Though I wasted major,
Nobody knows my efforts,
For everyone around,
I am just a normal girl,
A mere Girl,
A poor Girl....

But hey..
I am not ..
I am not,
The one,
You think,
You observed,
And you predict....

I am totally abnormal,
I've uncounted achievements,
I am rich,

Though Richness has different direction,
Nobody knows my unique meanings,
For everyone around,
I am just a beautiful girl,
At every next door,
With lots of attitude,
absent mind,
Nd Always lied,
Nd Future surely bright..

But hey..
I am not,
I'hv d beauty resource,
She is my mom,
But something I'hv,
Which is mine,
I think,
Nd I feel,
Nd I hope,

I dream,
Nd I fly,
Nd I swim..

See,
I'hv a mind,
O..yes, yes
I am pure,
I am feminine,

Hey,
Its a lady believe,
Not the atti,
Your's ...fragnance,
The style,
All one side..

My one,
Only one,
pure smile,
Direct from the heart,
Is more brighter...

So...
keep that in your mind,

I am not...
I am not..
Just a beautiful girl
Or the girl next door,
Or a poor girl
Or a mere girl....
© गुंजन झाझारिया

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दैवीय प्रेम

निःस्वार्थ,
ना तुम हो पाए,
ना मैं।
मुझे तुम्हारा सुख चाहिए था,
तुम्हें मेरे रंग सहेजने थे।
और इस तरह,
हम दोनों मनुष्य ही रह गये।
# वरना हमारा प्रेम तो दैवीय था।
© गुंजन झाझारिया

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'मैं' मुझे खोजने दो।

मैं हूँ कोई खिलौना बुना हुआ,
या कोई मोहरा चुना हुआ।।
निराकार हूँ कि साकार,
मोक्ष या माया,
मैं क्रोध हूँ, अग्नि हूँ,
जल हूँ तरंगित, या
बर्फ आधी जमी।
मैं सागर गहरा,
प्रकृति का पहरा,
मैं ज्वालामुखी दबा हुआ,
या कोई आकाशगंगा हूँ,
अनगिनत सितारों से भरा रहस्य।।
सम्मान की भूख हूँ,
या अभिमान का अहंकार,
हूँ कोई अधिकार पत्र,
या फिर अपमान का मुखौटा,
मैं स्वार्थ हूँ,
कीचड़ का कमल हूँ,
या सूअर की नाक,
बदबू पहचान लेने वाली..
मैं सफ़ेद हँस,
या चमत्कारी डायनासौर,
विशाल, सर्वनाशी,
मैं रचियता,
हवा से घर बनाने में समर्थ,
या हूँ बवंडर,
उम्मीद ढाने वाला।।
मैं सुरंग,
अँधेरी, गहरी,
मैं निःस्वार्थ दान हूँ,
या मैं,
कपट से छिना गया गहना।
पथरीला कंकड़ हूँ,
आँखों में चुभने वाला,
गाली हूँ,
या आशीर्वाद का बोल,
मैं ताश का पत्ता,
या ताज जीत का,
प्रेम हूँ दबा हुआ,
या नाता गुरुर का,

# मैं जो भी हूँ, मुझे खोजने दो।
तुम्हारा शौध मेरे काम का नहीं।
© गुंजन झाझारिया

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अलसाई सरसों

अलसाई सरसों में सौन्दर्य है,
बस आँखों में रंग होने चाहियें,
कण कण ईश्वर,
जरुरी है,
भाव सुंगंधित होने चाहियें।
एक स्त्री की ओढ़नी से,
पौंछ ले धब्बे काले,
जिस पर रंग दूजा नही चढे,
उसका मोल,
ऊँचा लगना चाहिए।
संध्या की पायल,
खनकती रहेगी सदा,
बिन बौखलाए,
प्रभात को गाना चाहिए।
पाक दहलीज,
हर घर के आगे,
लांघने से पहले,
माथे लगा चूमना चाहिए।
मस्तिष्क है घर,
बेबुनियादी शर्तो का,
मिलावट करता छल,
ह्रदय का सम्मान,
नहीं घटना चाहिए।
तू सदी-स्त्री,
तेरा भी अपना एक,
ईमान होना चाहिए।
धर्म छोड़ चाहे,
कर्म ना छोड़,
नहीं कोई ऊँचा नीचा,
पहाड़ चढ़,
माटी वहाँ भी मिलेगी,
जीव को जीव समझ,
आईने में पहचाने स्वयं को,
ईरादा भाप होना चाहिए,
केवल शुद्ध पानी,
बिना फ्लोराइड का।
© गुंजन झाझारिया

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द्वंद्व (भाग 1)

द्वंद्व चल रहा है,
बुद्ध बनना चाहती हूँ,
कभी भी किसी विषय को पकड़,
सोचती हूँ क्या क्यों कैसे,
विज्ञान की विद्यार्थी बनने का असर,
कदाचित पागल ही कहेंगे लोग,
जब छोटी सी बात पर गुस्सा जाऊं,
किन्तु सच मेरी बैसाखी है,
एक पल भी कोई छिनना चाहे तो,
लडखडाने का भय खाता है।
कभी मैं नारी बनना चाहती हूँ,
मुस्कुराहट टांगे मुंह पर,
सब देखती है,
मतलब नहीं निकालती,
डरती है,
अर्थ निकाला तो बोल फुट पड़ेंगे,
बोल फूटे पुरुष के सामने,
तो डह जाएगी नारीत्व की दीवार,
ऐसे महाभारत में,
मैं कभी मैं ही रहना चाहती हूँ।
To be continued......
© गुंजन झाझारिया

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बुधवार, मार्च 19

गूँज की शायरी

1)मुझे भाती नहीं हैं मुस्कुराहटें,
कि 'गूँज'आजकल,
नकल-असल में फर्क नहीं।

2)दुआएं जो असरदार होती,
ए-माँ आज,
'गूँज' तेरी मालामाल होती।

3)नियम कायदों में क्या रखा है,
कि 'गूँज'
कतार बनाकर चलना,
भेड़ भी जानती है।

4) जवाब देना ना आये तुझे,
दुनिया दूसरे दिन गायब कर दे,
जो सही जगह पर मिले छुपा,
'गूँज' वो पत्थर नायाब कह दे।
© गुंजन झाझारिया

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गुरुवार, मार्च 13

कुछ तुम कम अक्लमंद हो,
कुछ हम जताते कम हैं,
इसलिए तो,
तुम बोलते चले जाते हो,
जब हमारा कद देखते हो,
और हम मौन पी जाते हैं,
जब तुम्हारा कद देखते हैं।
© गुंजन झाझारिया

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छेद

धुरंधर रोते हैं अंधकारों में,
गुप्प अन्धकार से अश्रुओं का मिलन,
कीमत सिखाता प्रकाश की,
अलग नहीं है कुछ,
बाँट देते हैं वो समय को,
चढ़ाई और आराम को,
छांट देते दिशाएँ ।
शेर अचूक शिकारी,
जानता कब कहाँ?
घात को हथियार बना,
करता इंतज़ार,
उर्जा तुझमें भी अपार,
ले समय,
और होगा विस्तार,
सटीकता का खेला,
बन गया अर्जुन,
जिसने भी है खेला,
दिग्गज भी झुकाते हैं सिर,
कब कहाँ?,
सोचकर ही फिर,
ज्योतिषी पूजती दुनिया,
उचित समय की लड़ाई में,
जाने धीरज जो,
मानुष कहलाता।
शीघ्रता का पल्ला पकडे,
वो दानुश बन जाता।
हाँ,
तीस मार खां गिरते चोटी से,
शौक नही मनाते,
क्यूंकि,
उठकर चढाई का,
समय निर्धारित रहता,
कोई नहीं है भेद फिर,
है कच्चा तू अगर,
पहले सीख निशाना बांधना,
कर छेद फिर।।
© गुंजन झाझारिया

लेबल:

तिरस्कारित होने पर उसी से सम्मान जीतने का जज़्बा रख,
तिरस्कार के बदले तिरस्कार,
बुद्धिहीन आदत,
तू ना रख,
सम्मान लेने का जूनून,
स्वादिष्ट व्यंजन की सुगंध जैसा,
पक जायेगा जब,
तृप्त होगी आत्मा कहकर,
चख,
ज़रा चख,
और चख।।।
© गुंजन झाझारिया

लेबल:

मालामाल

तेरा ज़मीर न उड़ा ले जाएँ,
ये आंधियां,
दबा कर रख ले कहीं।
काम लेने की क्या जरुरत,
किसी को भनक भी लगे नहीं।
चुरा ले जाएगा ज़माना,
कंगाल तू हो जाएगा,
मन की तसल्ली लुट जाएगी,
खड़े खड़े अभी यहीं।
दबा ले इस वहम को,
भूल जा,
क्या गलत, क्या सही।
किसने चुराया,
किसने कमाया,
कौन देखता है,
जिसके हाथ में हो सोना,
मालामाल कहलाये वही।
© गुंजन झाझारिया

दिन उगेंगे-ढलेंगे

बढाता चल कदम यूँही,
रास्ते खुदबखुद मिलेंगे।
बरसों से,
बंद पड़े होंगे जो दरवाजे,
रखेगा जो भरोसा स्वयं पर,
तेरी कर्मठता से जरुर खुलेंगे।।
'गूँज' मुस्कराहट के साथ,
तेरी आवाज़ के सुर,
हिमालय को भी चीर देंगे।
फूलों की सुगंध से भटकना नहीं,
गुलशन भी मुरझा जाते हैं,
होगा जब तू मजबूत,
तभी तेरे नाम के सिक्के चलेंगे।
देना फिर तोहफे तू,
कि तेरे क़दमों की आहट से,
दिन उगेंगे, दिन ढलेंगे,
दिन उगेंगे, दिन ढलेंगे।।।
© गुंजन झाझारिया

लेबल:

जुगनूं का पता

जुगनू के जैसे,
अपना एक पता होता।
चमकने-चमकाने का,
छुपने-छुपाने का,
किस्सा कोई,
समाज होता।
हथेलियों में,
सहेजी जाती उड़ानें,
जब कोई,
रात से डरा,
घबराया राहगीर,
भटक गया होता।
साथ पाने के लिए,
हर किसी को,
पानी की,
ठंडाई से भीगना होता।
खामोश,
चाल से चलना होता,
रोकनी होती सांसें,
बहते लहू को,
सुनना होता।
छपछपाहट,
कदमों की,
खड़े करती रौंगटे,
रोमांच का,
अद्भुत अहसास होता।
पूछी जाती,
वो मुलाकातें,
जब दर्शन,
भली किस्मत,
मिलन उससे,
एक अहसान होता।
जुगनूं के जैसे अपना,
एक पता होता।
© गुंजन झाझारिया

लेबल:

राई का पहाड़

सुना है,
हमारे किस्से सरेआम हो गए?
जिनमें तुम यूँ ही मुस्कुराए,
और मैंने यूँ ही शरमा दिया था।
राई थी,
पहाड़ बना,
एक जैसा कुछ तो है हमारा,
तभी खोजती आँखों ने ढूंढ़ ली राई,
किसी को हिसाब देने का ईरादा नहीं,
हर लम्हे को जीवन कहना,
हम दोनों की आदत,
थी और हमेशा रहेगी।
© गुंजन झाझारिया

लेबल: